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Sunday, 3 January 2010

भूकम्प की भविष्यवाणी : नये अध्ययन ---इंजी. विवेकरंजन श्रीवास्तव


भूकम्प की भविष्यवाणी : नये अध्ययन




इंजी. विवेक रंजन श्रीवास्तव



लेखक फाउण्डेशन इंजीनियरिंग में पोस्टग्रेडुएट हैं .


भूकम्प सदियों से पृथ्वी पर विनाशलीला रचाते आए हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके आगे हम बेबस है, क्योंकि भूकम्प के पूर्वानुमान का कोई प्रभावी तरीका अब तक नहीं खोजा जा सका है। विश्वभर में वैज्ञानिक ऐसा कोई तरीका ढूँढने का प्रयास करते रहे हैं। इसी दिशा में नवीनतम अनुसंधान , निम्नानुसार धरती की सतह से कोई ४० कि.मी. नीचे होने वाले खामोश भूकम्पों के प्रभावो के अध्ययन तथा दूसरा प्रयोग समुद्र तटीय भूकम्पों की भविष्यवाणी हेतु समुद्र के पानी में क्लोरोफिल की मात्रा के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित है .


'खामोश भूकम्पों' को समय रहते पहचाने


अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय तथा जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक दल ने 'खामोश भूकम्पों' को समय रहते पहचानने के तरीके पर काम किया। 'खामोश भूकम्प' ऐसे कम्पन को कहते हैं, जो धरती की सतह से ४० किमी. नीचे तक होते हैं और कई सप्ताहों तक लगातार चलते रहते है। हालांकि ये कंपन कोई विशेष हानि नहीं करते लेकिन भूकम्प शास्त्रियों का मानना है कि ये सतह पर आने वाले बड़े भूकम्पों की पूर्व सूचना होते हैं। अर्थात् यदि खामोश भूकम्प आ रहा है तो इसके बाद सतह पर भी भूकम्प आएगा। समस्या यह है कि इन खामोश भूकम्पों को धरती की सतह पर तो महसूस किया नहीं जाता, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम पर भी इन्हें दर्ज होने में काफी समय लगता है। तो समय रहने इनका पता कैसे लगाया जाए ?


अब अमेरीकी व जापानी शोधकर्ताओं ने एक तरीका खोज निकालने का दावा किया है। उन्होंने पाया कि खामोश भूकम्प के फलस्वरुप गैर ज्वालामुखीय कम्पन शुरु हो जाता है। खामोश भूकम्प तो जाँच उपकरणों की पकड़ में नहीं आते लेकिन गैर ज्वालामुखीय कंपनों को संवेदनशील यंत्र पकड़ लेते हैं। गैर ज्वालामुखीय कंपन उन हल्के कम्पनों को कहते हैं, जो सक्रिय 'फॉल्ट जोन' में काफी गहराई में उत्पन्न होते हैं। खामोश भूकम्प बड़े भूकम्प की चेतावनी देते हैं लेकिन खामोश भूकम्पों को हमारे यंत्र पकड़ नहीं पाते। खामोश भूकम्प गैर ज्वालामुखीय कम्पनों को जन्म देते हैं, जो हमारे संवेदनशील यंत्र पकड़ लेते हैं। तो इन गैर ज्वालामुखीय कम्पनों का पता करके हम भूकम्प की भविष्यवाणी कर सकते हैं।


उक्त शोध से जुड़े ग्रेगरी बेरोजा के अनुसार - 'फॉल्ट जोन में तापमान व दाब बढ़ने पर धरती की प्लेट में मौजूद खनिज अधिक घनत्व के साथ आपस में जुड़ जाते हैं और पानी छोड़ने लगते हैं। पानी छूटने से हल्के कंपन शुरु हो जाते हैं। साथ ही इससे प्लेटों के बीच कुछ चिकनाई उत्पन्न हो जाती है। इससे प्लेटों का आपस में रगड़ना सुगम हो जाता है और खामोश भूकम्प आने लगता है। फॉल्ट में पहले से मौजूद तनाव इन खामोश भूकम्पों के कारण बढ़ जाता है। जब यह तनाव एक सीमा से बढ़ जाता है, तो बड़ा भूकम्प आता है, जो धरती की सतह पर विनाशलीला कर जाता है।' इस अध्ययन से उम्मीद है कि निकट भविष्य में भूकम्प का सटीक पूर्वानुमान लगाना सम्भव हो जाए और माल की न सही, जान की हिफाजत बड़े पैमाने पर की जा सकेगी ।


समुद्र की सतह पर क्लोरोफिल की मात्रा का अध्ययन


भूकम्प पर ही एक अध्ययन भारतीय व अमेरिकी शोधकर्ताओं के दल ने किया है । इन्होंने पाया कि समुद्री किनारों पर पानी में क्लोरोफिल की मात्रा की वृद्धि पर नजर रखकर समुद्री किनारों पर आने वाले भूकम्प का अनुमान लगाया जा सकता है।समुद्र के धरातल में भूकम्पीय गतिविधियो या ज्वालामुखीय घटनाओ से समुद्र की सतह से पानी का वाष्पीकरण बढ़ जाता है। जब सतह पर वाष्पीकरण अधिक होता है, तो गहराई वाला ठंडा पानी उठकर सतह की ओर बढ़ता है। तापीय उर्जा के कारण वाष्पीकरण बढ़ने पर ,तथा समुद्र की तलहटी में ज्वालामुखीय घटनाओ से पानी का ऊपर की ओर उठने का सिलसिला भी बढ़ जाता है। यह ऊपर उठने वाला पानी ऐसे पोषक तत्व से भरपूर होता है, जिनसे फायटोफ्लैंक्टन (सुक्ष्म समुद्री पौधे) पोषण ग्रहण कर बढ़ते हैं। ये पौधे क्लोरोफिल द्वारा सूर्य से उर्जा ग्रहण कर अपना भोजन तैयार करते हैं।इस तरह समुद्र की सतह पर क्लोरोफिल की मात्रा अचानक बढ़ जाती है . क्लोरोफिल की उपस्थिति उपग्रह से प्राप्त चित्रों में भी देखी जा सकती है , इस तरह समुद्री जल सतह पर क्लोरोफिल की मात्रा की गणना के अध्ययन से भी भूकम्प , सुनामी की भविष्यवाणी करने की संभावना है.

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Tuesday, 29 December 2009

भू गर्भीय हलचल और भूकंपीय श्रंखला : एक दृष्टिकोण --प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव


विशेष आलेख:


भू गर्भीय हलचल और भूकंपीय श्रंखला : एक दृष्टिकोण

प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव, अध्यक्ष, इन्डियन जिओटेक्निकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर

विश्व में कहीं न कहीं दो-चार दिनों के अंतराल में छोटे-बड़े भूकंप आते रहते हैं किन्तु भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र जिसे सुरक्षित क्षेत्र (शील्ड एरिया) मन जाता है, में भूकम्पों की आवृत्ति भू वैज्ञानिक दृष्टि से अजूबा होने के साथ-साथ चिंता का विषय है. दिनाँक २२ मई १९९७ को आये भीषण भूकंप के बाद १७ अक्टूबर को ५.२ शक्ति के भूकंप ने नर्मदा घाटी में जबलपुर के समीपवर्ती क्षेत्र को भूकंप संवेदी बना दिया है. गत वर्षों में आये ५ भूकम्पों से ऐसा प्रतीत होता है कि १९९७ के भूकंप को छोड़कर उत्तरोत्तर बढ़ती भूकंपीय आवृत्ति का पैटर्न भावी विनाशक भूकंप की पूर्व सूचना तो नहीं है?

विशव में अन्यत्र आ रहे भूकम्पों पर दृष्टिपात करें तो विदित होता है कि गत ४ वर्षों से भूकंपीय गतिविधियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया में केन्द्रित हैं. विश्व के अन्य बड़े महाद्वीपों यथा अफ्रीका, उत्तर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका तथा यूंरेशिया आदि में केवल १-२ बड़े भूक्न्म आये हैं जबकि भारत, चीन. जापान. ईराक, ईरान, तुर्की, ताइवान, फिल्लिपींस, न्यूजीलैंड्स, एवं इंडोनेशिया में प्रति २-३ दिनों के अन्तराल में कहीं न कहीं एक बड़ा भूकम्प आ जाता है या एक ज्वालामुखी फूट पड़ता है. यहाँ तक कि हिंद महासागर में एक नए द्वीप नव भी जन्म ले लिया है.

दक्षिणी-पूर्व एशिया की भू-गर्भीय हलचलें अब जापान, ताइवान एवं भारत में होनेवाली भूकंपीय गतिविधियों में केन्द्रित हैं. दक्षिण ताइवान में ४ अप्रैल को आये भूकंप (५.२) से प्रारंभ करें तो ५ अप्रैल को माउंट एटनाविध्वंसक विस्फोट के साथ सक्रिय हुआ. इसके साथ ही भारत में ७, ११ एवं २७ अप्रैल को क्रमशः महाराष्ट्र, त्रिपुरा एवं शिमला में तथा २ मई को छिंदवाड़ा में भूकंप के झटके महसूस किये गए. २५ मई को कोयना में झटके आये तथा २६ मई को नए द्वीप का जन्म हुआ. दिनांक ३.६.२०० को सुमात्रा में ७.९ तीव्रता का भूकंप आया. ५.६.२००० को तुर्की में ५.९ तीव्रता का, ७ व ८ जून को क्रमशः जापान (४.४), म्यांमार (६.५), अरुणांचल (५.८), सुमात्रा (६.२) तथा १०-११ जून को ताइवान(६.७) व (५.०) तीव्रता के भूकम्पों ने दिल दहला दिया.

इसके अतिरिक्त १६ से २० जून के बीच ७.५ से ४.९ तीव्रता के भूकम्पों की एक लम्बी श्रंखला कोकस आईलैंड्स, इंडोनेशिया, ताइवान, मनीला, लातूर, शोलापुर, उस्मानाबाद आदि स्थानों में रही. २३.६.२०० नागपुर एवं चंद्रपुर (२.८) २५.६.२००० जापान (५.६) के अतिरिक्त इम्फाल, शिलोंग, व म्यांमार (४.२) में भी भूकप का झटके कहर ढाते रहे.

५ जुलाई २००० को जापान में ४ झटके, ७ जुलाई को भारत में खरगौन तथा ८ जुलाई को जापान में ज्वालामुखीय उदगार, ११ जुलाई को जापान में बड़ा भूकंप, १३ जुलाई को जापान में बड़ा सक्रिय ज्वाला मुखी १८ से २४ जुलाई तक जापान में २, ताईवान में ३ एवं एवं इंडोनेशिया में १ भूकंप दर्ज हुआ जिसके साथ भारत में पंधाना, भावनगर एवं कराड में झटके महसूस किये गए. २ अगस्त को उत्तरी जापान में तीसरा ज्वालामुखी सक्रिय रहा. १ सितम्बर से १२ सितम्बर तक भारत में ४ भूकंप दर्ज हुए. १४ सितम्बर को जापान में ५.३ तीव्रता तीव्रता का भूकंप आया. ६ अक्तूबर को पश्चिमी जापान में ७.१, अंडमान में ५.४, सरगुजा में लंबी दरारें पड़ना, तथा अंबिकापुर में भूकंप के हलके झटके अनुभव किये गए. १२.१०.२००० को हिमाचल प्रदेश में तथा १७.१०.२००० को जबलपुर (५.२), १९.१०.२००० को भारत-पाक सीमा तथा कोयना क्षेत्र में भूकंप आया. २७.१०.२०० को जापान में चौथा ज्वालामुखी सक्रिय हुआ.

अद्यतन ये भूगर्भीय हलचलें जो गहरी ज्वालामुखीय घटनाओं को प्रेरित कर रही हैं, इनके कारण ही भूकम्पों की बारम्बार पुनरावृत्ति हो रहे ऐसी मेरी मान्यता है.

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